Wednesday, August 11, 2010

गुर्वष्टकम् -आद्य शंकराचार्य

गुर्वष्टकम्

-आद्य शंकराचार्य कृत गुर्वष्टकम्

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं,
यशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
1. यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ?
1. One’s body may be handsome, wife beautiful, fame, excellent and varied, and wealth like unto Mount Meru; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 

कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वं,
गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
2. सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इस प्रारब्ध-सुख से क्या लाभ?2. Wife, wealth, sons, grandsons, etc., all these; home, relations- the host of all these there may be; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 

षड़ंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या,
कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
3. वेद एवं षटवेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?
3. The Vedas with their six auxiliaries and knowledge of sciences may be on one’s lips; one may have the gift of poesy; and may compose good prose and poetry; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence?
   
विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः,
सदाचारवृत्तेषु मत्तो चान्यः |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
4. जिन्हें विदेशों में समादर मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उनका भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो सदगुणों से क्या लाभ?
4. In other lands I am honored; in my country I am fortunate; in the ways of good conduct there is none that excels me-thus one may think, but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 

क्षमामण्डले भूपभूपलबृब्दैः,
सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
5. जिन महानुभाव के चरणकमल पृथ्वीमण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित रहा करते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इस सदभाग्य से क्या लाभ?
5. One’s feet may be adored constantly by hosts of emperors and kings of the world; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्,
जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
6. दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिगदिगांतरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपादृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-एश्वर्य हस्तगत हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों में आसक्तभाव न रखता हो तो इन सारे एशवर्यों से क्या लाभ?
6. My fame has spread in all quarters by virtue of generosity and prowess; all the things of the world are in my hands as a reward of these virtues; but if one’s mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 

भोगे योगे वा वाजिराजौ,
कन्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम् |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
7. जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, स्त्री-सुख और धनोभोग से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो मन की इस अटलता से क्या लाभ?
7. Not in enjoyment, not in concentration, not in the multitudes of horses; nor in the face of the beloved, nor in wealth does the mind dwell; but if that mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 

अरण्ये वा स्वस्य गेहे कार्ये,
देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये |
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
8. जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भण्डार में आसक्त न हो, पर गुरु के श्रीचरणों में भी वह मन आसक्त न हो पाये तो इन सारी अनासक्त्तियों का क्या लाभ?
8. Not in the forest, nor even in one’s own house, nor in what-is-to-be-accomplished, nor in the body, nor in what is invaluable does my mind dwell; but if my mind be not attached to the lotus feet of the Guru, what thence, what thence, what thence, what thence? 


अनर्घ्याणि रत्‍नादि मुक्‍तानि
सम्यक्समालिंगिता कामिनी यामिनीषु ।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ||||
9. अमूल्य मणि-मुक्तादि रत्न उपलब्ध हो, रात्रि में समलिंगिता विलासिनी पत्नी भी प्राप्त हो, फिर भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाये तो इन सारे ऐश्वर्य-भोगादि सुखों से क्या लाभ?


गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेही,
यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी गेही |
लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञं,
गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ||||
10. जो यति, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवं ब्रह्मपद इन दोनों को संप्राप्त कर लेता है यह निश्चित है |
10. That virtuous person who reads this octad on the Guru, and whose mind is fixed on the sayings of the Guru- whether he be an ascetic, king, student, or householder, attains the desired goal, the state which is called Brahman


॥ इति श्रीमद् आद्य शंकराचार्यविरचितम् गुर्वष्टकम् संपूर्णम् ॥


No comments:

Post a Comment